हिंसा का मानस

अमेरिका में टेक्सास के एक प्राथमिक स्कूल में हुई गोलीबारी ने एक बार फिर इस बहस को ताजा कर दिया है कि आखिर ऐसी घटनाओं की वजह और इसके स्रोत क्या हैं और ये कैसे रुकेंगी! वहां कैसे हालात विकसित हुए हैं

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अमेरिका में टेक्सास के एक प्राथमिक स्कूल में हुई गोलीबारी ने एक बार फिर इस बहस को ताजा कर दिया है कि आखिर ऐसी घटनाओं की वजह और इसके स्रोत क्या हैं और ये कैसे रुकेंगी! वहां कैसे हालात विकसित हुए हैं जिसमें एक महज अठारह साल का लड़का खुले बाजार से बंदूक खरीदता है, अपनी दादी को गोली मार देता है, फिर स्कूल में जाकर अंधाधुंध गोलियां बरसाने लगता है।

उन्नीस बच्चों और दो अन्य वयस्कों के मारे जाने के बाद वह लड़का भी मारा गया। लेकिन दुखद यह है कि यह ठीक-ठीक पता लगाना मुश्किल है कि इस बेलगाम गोलीबारी का कारण क्या है! निश्चित रूप से यह प्रथम दृष्टया भी अपराध है और बचाव के क्रम में हुए मुठभेड़ में हमलावर मारा गया, मगर अमेरिकी सरकार और समाज के लिए यह सोचने का वक्त है कि ऐसे हमले आम क्यों होते जा रहे हैं। सवाल है कि अगर अपरिपक्व समझ वाला कोई युवक आसानी से कोई घातक बंदूक हासिल कर लेता है, तो क्या केवल यही यह बताने के लिए काफी नहीं है कि ऐसे हमले के पीछे क्या आधार होगा और इसके क्या हासिल होंगे?

ऐसा लगता है कि समाज और व्यवस्था के मामले में अमेरिका बहुस्तरीय चुनौतियों से जूझ रहा है। ठीक से युवावस्था में भी नहीं पहुंचा एक युवक संवेदना से इस कदर शून्य हो जाता है तो इसकी जड़ में क्या है? आखिर किन हालात में उसे आठ-दस साल के बच्चों तक को गोलियों से भून देने में कोई हिचक नहीं हुई? यह किसी छिपा नहीं है कि अमेरिका में किसी को भी घातक हथियार और खासतौर पर बंदूक किस तरह आम लोगों को भी आसानी से उपलब्ध हैं। यों कोई भी जानलेवा हथियार अगर लोगों के पास है या उन्हें बिना अड़चन के मिल जाते है, तो पहली चूक यहीं हो जाती है।

एक तरफ आसानी से हासिल हो जाने वाले हथियार और दूसरी ओर बिना वजह के भी बेलगाम जाने वाले कुछ लोग। ऐसी स्थिति में अंजाम का अंदाजा लगाना बहुत मुश्किल नहीं होता है। सही है कि टेक्सास की ताजा घटना में गोलीबारी करने वाला लड़का कोई प्रतिनिधि उदाहरण नहीं है और सारे ऐसे लोग नहीं हैं। लेकिन सवाल है कि ऐसे कुछ लोग भी हैं और उन्हें बंदूक या घातक हथियार खुले बाजार में आसानी से उपलब्ध हो जाते हैं, तो कैसे हालात पैदा होंगे!

हालत यह है कि अमेरिका में केवल इस साल अब तक ऐसी छोटी-बड़ी सत्ताईस घटनाएं सामने आ चुकी हैं, जिसमें एक सौ से ज्यादा लोगों की जान चुकी है। एक तरह से बंदूक संस्कृति के चलते ही बिना वजह लोगों को जान गंवानी पड़ती है। टेक्सास में गोलीबारी दरअसल ऐसी घटनाओं की एक कड़ी भर है। हाल ही में न्यूयार्क के बुफैलो में किराने की एक दुकान में बेवजह ही गोलीबारी करके दस अश्वेत लोगों की हत्या कर दी गई। यह बेवजह नहीं है कि अमेरिका में अक्सर ऐसी घटनाओं के सामने आने के संदर्भ में यह मांग की जाती रही है कि बंदूक संस्कृति को नियंत्रित किया जाए।

ताजा घटना के बाद खुद अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन ने भी कहा कि हम बंदूकों की बिक्री का समर्थन करने वालों के खिलाफ कब खड़े होंगे! सवाल है कि अगर अमेरिका में हथियार रखने को लेकर कोई सख्ती या पाबंदी नहीं है तो इनके जरिए होने वाले हमलों से लोगों को बचाने की क्या व्यवस्था है? सच यह है कि अमेरिका और वहां के समाज ने बंदूक रखने की संस्कृति से गंवाया बहुत कुछ है, लेकिन अब तक सकारात्मक कुछ भी हासिल नहीं किया है।

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मनोज शर्मा

मनोज शर्मा (जन्म 1968) स्वर्णिम भारत के संस्थापक-प्रकाशक , प्रधान संपादक और मेन्टम सॉफ्टवेयर प्राइवेट लिमिटेड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं।

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