धर्मांधता की हिंसा

राजस्थान के उदयपुर में मंगलवार को धर्म के नाम पर बर्बर हत्या की जैसी घटना सामने आई, उसने सबको यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि एक सभ्य समाज के रूप में हम कितना विकास कर सके हैं। गौरतलब है कि उदयपुर में

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राजस्थान के उदयपुर में मंगलवार को धर्म के नाम पर बर्बर हत्या की जैसी घटना सामने आई, उसने सबको यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि एक सभ्य समाज के रूप में हम कितना विकास कर सके हैं। गौरतलब है कि उदयपुर में एक व्यक्ति को दो लोगों ने क्रूरता से मार डाला, क्योंकि उसने एक महिला राजनीतिक के आस्था से संबंधित विवादास्पद बयान के समर्थन में सोशल मीडिया पर अपनी राय जाहिर की थी।

यही नहीं, हत्यारों ने अपनी बेरहमी का वीडियो भी बनाया और उसे सार्वजनिक किया। क्या ऐसे असभ्य कृत्य के जरिए किसी धर्म या इससे संबंधित प्रतीकों का सम्मान बचाया जा सकता है? क्या कोई भी धर्म ऐसी बर्बरता की इजाजत देता है? क्या ऐसे कृत्यों में विश्वास रखने वाले लोग अपने ही धर्म को अपमानित नहीं करते हैं? आखिर क्या वजह है कि जो लोग अपने मजहब को मानवता के कल्याण का सबसे अहम जरिया बताते हैं, वे ही किसी इंसान को सिर्फ इसलिए मार डालते हैं कि उसने किसी मसले पर अपनी अलग राय रखी थी?

जाहिर है, धर्म को बचाने के नाम पर की गई इस तरह की हिंसा को धर्मांधता से ज्यादा का दर्जा नहीं दिया जा सकता। लेकिन इस त्रासद घटना के लिए सरकारी महकमे और पुलिस की भी जिम्मेदारी बनती है। खबरों के मुताबिक, मारे गए व्यक्ति ने सोशल मीडिया पर लिखी टिप्पणी के बाद मिलने वाली धमकियों को लेकर पुलिस को सूचित भी किया था।

सवाल है कि ऐसे संवेदनशील मामलों में होने वाले अपराधों के उदाहरण आते रहने के बावजूद पुलिस ने जरूरी कार्रवाई क्यों नहीं की? किन वजहों से उसने मारे गए व्यक्ति की सुरक्षा के लिए कोई इंतजाम नहीं किया? हत्या की घटना के बाद जब मामले ने तूल पकड़ लिया तब पुलिस ने अपनी ‘सक्रियता’ का उदाहरण पेश करते हुए इस बर्बर कृत्य में शामिल दो लोगों को गिरफ्तार कर लिया। जब नाहक ही एक व्यक्ति को मार डाला गया तो उसके बाद राज्य सरकार और पुलिस चाहे कितनी भी सक्रियता का दिखावा कर ले, लेकिन सच यह है कि अगर समय रहते जरूरी कदम उठाए गए होते तो शायद एक जीवन बच जाता।

दरअसल, धर्म के नाम पर होने वाली हिंसक घटनाओं का यह कोई पहला उदाहरण नहीं है। राजस्थान के ही राजसमंद जिले में करीब साढ़े चार साल पहले लगभग इसी प्रकृति की बर्बर हत्या की एक घटना सामने आई थी, जिसमें हत्यारे ने वीडियो भी बनाया था। उसमें भी केंद्रीय-तत्त्व धर्मांधता की हिंसा ही था। सवाल है कि अलग-अलग धर्मों से जुड़े इस तरह के लोगों के दिमाग में ऐसी बर्बरता किस तरह जगह बनाती है? कोई भी धर्म या उसके संचालक समूह अगर अपने मानने वालों के भीतर कट्टरता का भाव भरेंगे या उसके रूढ़ स्वरूप को ही किसी व्यक्ति की चेतना का हिस्सा बनाएंगे, तो नतीजे के तौर पर उसके ऐसे ही व्यवहार सामने आएंगे।

यह समझना मुश्किल है कि सार्वजनिक तौर पर अपने धर्म को मानवीय मूल्यों का सबसे बड़ा संरक्षक बताने वाले धर्मगुरु अपने अनुयायी समुदायों के बीच इसके मूल तत्त्व का वास्तव में प्रसार क्यों नहीं कर पाते या फिर किसी व्यक्ति को इस कदर असभ्य और बर्बर होने से क्यों नहीं रोक पाते! यह ध्यान रखने की जरूरत है कि धर्मांधता और हिंसा के जरिए अपनी मान्यता को बचाने का दावा करने वाले लोग दरअसल अपने धर्म को बचाते नहीं हैं, बल्कि मानवता और इस तरह अपने मजहब की हत्या ही करते हैं।

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मनोज शर्मा

मनोज शर्मा (जन्म 1968) स्वर्णिम भारत के संस्थापक-प्रकाशक , प्रधान संपादक और मेन्टम सॉफ्टवेयर प्राइवेट लिमिटेड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं।

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