ब्रह्माण्ड की गुत्थियों को सुलझाता मन

डॉ. वीर सिंह

मानव मन कभी किसी चीज से इतना आश्चर्यचकित नहीं हुआ जितना ब्रह्माण्ड से। ब्रह्माण्ड के सभी पहलू सदैव से ही मानव के लिए एक पहेली रहे हैं। यहाँ तक कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी की लम्

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डॉ. वीर सिंह

मानव मन कभी किसी चीज से इतना आश्चर्यचकित नहीं हुआ जितना ब्रह्माण्ड से। ब्रह्माण्ड के सभी पहलू सदैव से ही मानव के लिए एक पहेली रहे हैं। यहाँ तक कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी की लम्बी छलांगों से भी हमारे ब्रह्माण्ड की सम्पूर्ण जानकारी नहीं मिल सकी। हम सदैव अपने ब्रह्माण्ड के बारे में इतने कल्पनाशील होते हैं ! कोई भी वैज्ञानिक आविष्कार कभी भी हमारी जिज्ञासाओं को तृप्त नहीं कर सकता! जितना अधिक हम अपने ब्रह्माण्ड के बारे जानते हैं, उतना ही हम इसके बारे में अनभिज्ञ-से हो जाते हैं। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड हमारे मष्तिष्क में जम कर बैठा है और हमें उसके रहस्यों को सुलझाने के लिए लुभा रहा है!

विज्ञान और प्रौद्योगिकी ने हमारी सोच को पूरे ब्रह्माण्ड को एक बड़ी मशीन के रूप में और पृथ्वी को ब्रह्माण्ड से कटी एक स्वतंत्र इकाई के रूप में विश्लेषण करने के लिए प्रेरित किया है। चार्ल्स डार्विन के अपने अन्वेषण में प्रजातियों के विकास के बारे में बहुत प्रशंसित सिद्धांत ‘प्राकृतिक चयन के माध्यम से प्रजातियों की उत्पत्ति’ पृथ्वी को ब्रह्माण्ड से विलग कर देती है। जैसे कि जीवन की प्रक्रियाएं पृथ्वी से हे प्रारम्भ होती हैं और वहीँ उनका अंत हो जाता है और पृथ्वी ग्रह के इतर कोई कारक इसमें हस्तक्षेप नहीं करता!

पूरे ब्रह्माण्ड के संगीतमय स्पंदन की अनुभूति करने के लिए हमारी विचार प्रणाली में कोई जगह नहीं बची है। जीवन, जीवित ग्रह और ब्रह्माण्ड की वास्तविकताओं से सम्बंधित विचारों में परस्पर सम्बन्ध और सह-विकास की भावनाएं लुप्त-सी हो गईं हैं। मानों ब्रह्नाण्ड का जीवन और जीवित ग्रह से कुछ लेना-देना नहीं! हमारी आर्थिक व्यवस्था हमारे अस्तित्व के गर्व का अंतिम स्रोत बन कर उभरी है।

इन प्रणालियों ने मनुष्य को हर चीज के अंधाधुंध शोषण पर निर्भर बनाकर और पृथ्वी पर सह-अस्तित्व वाले जीवन के शेष रूपों से अलग करके मानव जीवन को हाशिए पर डाल दिया है। “मानव बनाम जीवन युद्ध” में मानव प्रजाति विजयी हो रही है, हालाँकि, यह विजय मानव प्रजाति को शनैः शनैः मौत की ओर घकिया रही है।

यह भी सिद्ध किया जाता है कि ब्रह्माण्ड के बारे में हमारी गहरी जानकारी के लिए विज्ञान और प्रौद्योगिकी मूल रूप से उत्तरदायी हैं। लेकिन यह सच नहीं है। ब्रह्माण्ड हजारों वर्षों से हमारे समाजों में चर्चा के सबसे रुचिकर विषयों में से एक रहा है। ब्रह्माण्ड विज्ञान के क्षेत्र में हम सहत्राब्दियों से अग्रणीय और असाधारण रूप से समृद्ध रहे हैं। हमारे प्रचीन ग्रंथ ब्रह्माण्ड ज्ञान से परिपूर्ण हैं।

हमने खगोलीय पिंडों की स्थिति के आधार पर अपने कैलेंडर विकसित किए हैं। हम सभी ग्रहों और चंद्रमाओं की स्थिति की सटीक गणना कर सकते हैं और उसके आधार पर हम सरलता से खगोलीय घटनाओं , जैसे चंद्र और सौर ग्रहण, शुक्र पारगमन, और इसी तरह की भविष्यवाणियां कर सकते हैं। आकाशगंगाओं और नक्षत्रों के बारे में तो हमारा ज्ञान अद्भुत रहा है। ब्रह्माण्ड की हमारी गहरी समझ के आधार पर हमने खगोल विज्ञान, ज्योतिष, भविष्य विज्ञान आदि विकसित किए गए हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका और नासा के प्रादुर्भाव से पहले ही भारतवर्ष का ब्रह्मांडीय ज्ञान असाधारण रूप से उन्नत हो चुका था।

मनुष्य सदैव अलौकिक जीवन के बारे में जिज्ञासु रहा है। पृथ्वी से परे जीवन की संभावनाओं के बारे में किसी समाचार का एक ‘फ़्लैश’ या एलियंस की बात मानव मन को मोहित करती है। मनुष्य की एक गहरी इच्छा यह जानने की रही है कि ब्रह्माण्ड में कहीं और भी जीवन है क्या। जब हम किसी अन्य ग्रह या चन्द्रमा पर जल, वातावरण, या कार्बनिक पदार्थ कि खोज के बारे में सुनते हैं तो हम रोमांचित हो जाते हैं और हमारा मन ख़ुशी से झूम उठता है। “हम अकेले नहीं हैं” एक उपमा बन गया है जो किसी अन्य ग्रह को जानने की निर्विवाद खोज में अन्तर्निहित है, जो हमारी पृथ्वी की तरह जीवन से लैस हो। मानव मन किसी “अन्य पृथ्वी” के बारे ने आशान्वित हो स्वयं को कल्पना-पोषित कर रहा होता है।

किसी अन्य ग्रह पर जीवन की सम्भावना के बारे में कोई साक्ष्य मिले तो हमारी आँखों में एक चमक आ जाती है। हमें लगता है जैसे हमें पृथ्वी पर ही जिंदगी का एक नया पट्टा मिल गया है। नई आशाएं और कल्पनाएं हमारी जिज्ञासाओं को पालती हैं, हमारे अन्वेषणों को जिन्दा रखती हैं, हमारे कार्यक्रमों और परियोजनाओं को नए आयाम देती हैं, और सबसे ऊपर, हमारे मष्तिष्क को ज्ञान की बूटी देती हैं। और आशाओं तथा कल्पनाओं का सबसे विस्तृत पटल है पृथ्वी से परे जीवन का विस्तार होने का साक्षी बनना।

पारिस्थितिक दार्शनिक प्रोफेसर हेनरिक स्कोलिमोस्कि ने अपनी पुस्तक “द पार्टिसिपेटरी माइंड” में मानव मष्तिष्क की अद्भुत रचनात्मक क्षमताओं के दर्शन कराए हैं। मानव मन हर चीज में, हर घटना में, हर प्रक्रिया में भागीदारी करता है, चाहे वह आसपास हो, पृथ्वी पर हो, दूसरे गृहों पर हो, अथवा पूरे ब्रह्माण्ड में, और अपना एक “बुद्धि मंडल” बनाता चलता है। बुद्धि मंडल, जितना विराट और ब्रह्माण्ड में अंदर तक विस्तार लेता जाता है, उतना ही ब्रह्मांडीय ज्ञान हम अर्जित करते जाते हैं। हमारे जीवन का सबसे रोचक पहलू यह है कि हमारा मन ब्रह्माण्ड की रहस्यमई यात्रा पर रहता है, अपने प्रभामंडल का विस्तार करते हुए और ब्रह्माण्ड की उलझी गुत्थियों को सुलझाते हुए।

(लेखक जीबी पंत कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय में एमेरिटस प्रोफेसर हैं।)

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मनोज शर्मा

मनोज शर्मा (जन्म 1968) स्वर्णिम भारत के संस्थापक-प्रकाशक , प्रधान संपादक और मेन्टम सॉफ्टवेयर प्राइवेट लिमिटेड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं।

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