पूर्वी चंपारण जिले के जसौली पट्टी गाँव जिसने चम्पारण सत्याग्रह को शक्ति दी,आज उदास है,लेकिन निराश नही : विनय सिंह

आयोजन के सरकारीकरण के बाद ठप है आयोजन

मोतिहारी/ अशोक वर्मा

गांधी के नाम को जप कर अपना गौरव बढ़ाने वाले सत्तारूढ़ दल के नेताओं एवं पदाधिकारियों को नहीं है गांधी की आत्मा में बसने वाले गांव जसौली पट्टी की चिंता ।यह दर्द भरी बाते क

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आयोजन के सरकारीकरण के बाद ठप है आयोजन

मोतिहारी/ अशोक वर्मा

गांधी के नाम को जप कर अपना गौरव बढ़ाने वाले सत्तारूढ़ दल के नेताओं एवं पदाधिकारियों को नहीं है गांधी की आत्मा में बसने वाले गांव जसौली पट्टी की चिंता ।यह दर्द भरी बाते कही है उक्त गांव के गांधीवादी विनय सिंह ने।उन्होने चम्पारण सत्याग्रह के 105 वर्ष पर बताया कि गांव के लोगों ने बड़े ही श्रद्धा और अरमान से चंद वर्ष पूर्वी चंपारण सत्याग्रह मार्च-अप्रैल मास में भव्य आयोजन आरंभ कर नई पीढ़ी को सत्याग्रह की जानकारी देने का अभियान शुरु किया था,लेकिन चंद वर्षों के बाद उस अभियान पर ग्रहण लग गया। सरकारीकरण होने के कारण आज अब वह बात नहीं रही और कार्यक्रम फिलहाल बंद करना पड़ा । उन्होंने बताया कि जसौली पट्टी गांव में जहां के महान क्रांतिकारी लोमराज सिंह ने अंग्रेजों से लोहा लिया था, गांधी जी जब चंपारण आए तो उन्होंने प्रथम इच्छा जसौली पट्टी गांव जाकर उस क्रांतिवीर से मिलने का निर्णय लिया था और उन्होंने प्रस्थान भी कर गए थे, लेकिन चंद्रहिया मे जाते जाते उन्हें प्रशासन द्वारा रोक दिया गया और वापस मोतीहारी लौटना पड़ा। यहीं से चंपारण सत्याग्रह की शुरुआत मानी जाती है।

स्वर्णिम भारत न्यूज़ चंद्रहिया गांव में गांधी स्मृति भवन आश्रम भी बन गया। यद्यपि वह भी उपेक्षित है। चंपारण वासियों को मलाल है कि कैसे जसौली पट्टी के महत्वपूर्ण आयोजन पर आज ग्रहण लग गया है। युवा गांधीवादी विनय सिंह ने बताया कि यहां गांधी जी पर आधारित बड़े-बड़े आयोजन हुये। अब जब की यहां कोरोना खत्म हो गया है, तो फंड का रोना चालू है। यहां लगभग 20 वर्षों से जन सहयोग से होने वाले चंपारण सत्याग्रह स्मृति दिवस समारोह पर ग्रहण लगता नजर आ रहा है। कहा जाता है कि किसी आयोजन का सरकारीकरण होने से उसकी स्वीकार्यता एवं जीविका बढ़ जाती है। लेकिन यहां उल्टा हो रहा है। 2019 तक जब यह आयोजन जनता का था तब तक तो ठीक था, छोटे बड़े पैमाने हो जाता था, लेकिन तत्कालीन विधायक सचिंद्र प्रसाद सिंह ने आयोजन हित में विधानसभा में सवाल उठाया तो बिहार सरकार के कला संस्कृति विभाग ने उसे अपने सरकारी कैलेंडर में शामिल करते हुए सात लाख की राशि देने की घोषणा कर दी। यहीं से आयोजन पर संकट के बादल छा गए।

पूर्वी चंपारण के जिलाधिकारी शीर्षत कपिल अशोक ने इस आयोजन की पहल करते हुए कला संस्कृति विभाग के सचिव को राशि मुहैया कराने के लिए ससमय एक पत्र लिखा जिसका पत्रांक 217 दिनांक 24 मार्च 2022 है। इसके बावजूद कला संस्कृति विभाग में बैठे लोगों की कारगुजारी के कारण यह आयोजन, समिति को अनिश्चित काल के लिए तिथि बढ़ाने के लिए विवश कर दिया है। सरकारी उदासीनता के कारण इस इतिहासिक गांव जसौली पट्टी के लोगों में उदासी व्याप्त है।

उल्लेखनीय है कि 15 अप्रैल 1917 को गांधी जी ने चंपारण आगमनके बाद16 अप्रेल 1917 मे अपनी पहली यात्रा इस गांव के लिए शुरू की थी । किसानों के नेता और अंग्रेजो के खिलाफ संघर्ष का बिगुल फूंकने वाले बाबू लोमराज सिंह के घर जाने के क्रम में चंद्रहिया उन्हें रोक दिया गया और भी वापस मोतिहारी लौट गए बाद में वे अपने प्रतिनिधिमंडल को जसौली पट्टी गांव भेज कर स्थिति की पूरी जानकारी ली। आज उक्त गांव में बाबू लोमराज सिंह की मूर्ति तो लगी है लेकिन उस प्रतिमा को आज भी इंतजार है बापू का ।

सर्वविदित है कि बिहार भ्रष्टाचार के आकंठ में डूबा हुआ है यहां घोषणाओं का अंबार अखबार की सुर्खियाँ बनता है, लोग खुश हो जाते हैं।एक तरह से लोग इसके अभ्यस्त हो चुके हैं, जानते हुए कि यह कार्य या नया कानुन भी भ्रष्टाचार की बेदी चढ़ जाएगा,पैसे का बंदरबांट ऊपर से नीचे तक हो जाएगा ,जनता को लाभ नहीं मिल पाएगी, बावजूद अखबार में पढ़कर लोग मुस्कुराते हैं कि बिहार के लिए नया कानून बना है, और कुछ होने की उम्मिद पाल लेते है, लेकिन होता कुछ नहीं है । जसौली पट्टी जो बाबू लोमराज सिंह के गांव के नाम से जाना जाता है,मे दो दशकों से चंपारण सत्याग्रह मार्च-अप्रैल में ग्रामीणों के द्वारा अपने स्तर पर जो आयोजन होता था उसके लिए कला संस्कृति विभाग ने इस आयोजन का अधिग्रहण कर लिया और राशि देने की बात कही, लेकिन सभी जानते हैं कि बिहार का कला संस्कृति विभाग कितना कार्यरत है? किसी भी एनजीओ को या किसी भी सरकारी फंड के निकासी के लिए बिहार में 25 से 50 फीसदी कमीशन एडवांस देने की बातें यहां पर सुनी जाती है। जसौली पट्टी के ग्रामीण निश्चित रूप से कमिशन देकर फंड नहीं ले सकते हैं। आयोजन के लिए वह जहर बन जायेगा। ग्रामीणौ ने यह भूल कर दी और सरकारी झांसे में आ गए।परिणाम सबके सामने है जसौली पट्टी का वह आयोजन आज बंद है ।चंपारण जिले में 25 वर्ष पूर्व एक बहुत ही बड़ा आयोजन चंपारण महोत्सव आरंभ हुआ था। निजी स्तर पर होने वाला वह आयोजन निर्बाध गति से 25 वर्षों तक चंपारण के विभिन्न ऐतिहासिक स्थलों पर होता रहा और आयोजन के माध्यम से महात्मा गांधी और चंपारण , चम्पारण के धरोहर, चंपारण के बिलुप्त लोक संस्कृति, चंपारण के संघर्ष की गाथा आदि पर चर्चाएं भी होती थी। वह बड़ा ही सुंदर आयोजन होता था, लेकिन कहीं से उस आयोजन के लिए सरकारी अधिग्रहण का प्रयास नहीं किया गया यही कारण रहा कि वह 25 वर्षों तक होता रहा ।

जसौली पट्टी के ग्रामीणों ने एक भूल कर दी सरकारी फंड के चक्कर में पड़ गए। ऐसा अमूमन देखा गया है कि जब भी सरकारी फंड मिलना आरंभ होता है वहीं से भ्रष्टाचार की भी शुरुआत होती है ।आयोजन कमेटी के बीच आपसी विवाद, पैसे का लेनदेन भी होता है और सबसे बड़ी हानि यह होती है कि आयोजन के प्रति आम लोगो मे बहुत अधिक लगाव नहीं रह जाता है। इस तरह से उसे सरकारीकरण कहा जाता है। जैसे सरकारी चिकित्सक, सरकारी सेवा, सरकारी स्कूल आदि की स्थिति आज हम लोग देख रहे हैं। वहीं दूसरी ओर निजी सेक्टर के संस्थाओं के स्वरूप को भी लोग देख रहे है । सरकारीकरण का मतलब भ्रष्टाचार की शुरुआत। सरकारी फंड लेने के लिए सर्वप्रथम 25 से 50 फीसदी राशि रिश्वत के रूप में एडवांस कटवा देना पड़ता है तब अनुदान की राशि मिल पाती है ,यह सभी लोग जानते हैं । स्वामी हरिदास संगीत विद्यापीठ के सचिव कृष्ण प्रसाद ने बताया कि स्थानीय विधायक प्रमोद कुमार जब कला संस्कृति मंत्री थे तब कलाकारों को पेंशन तथा कला से संबंधित सभी संस्थाओं को अनुदान देने की घोषणा की थी लेकिन किसी को कुछ नहीं मिला। पहले सरकार द्वारा जो अनुदान दिया जाता था वह तमाम बंद है ।

फिल्म निर्माता-निर्देशक रंगमंच के पुराने कलाकार मंजर खान ने बताया कि आज मैंने कला संस्कृति के माध्यम से पूरे बिहार में जागृति लाने का प्रयास किया ।पशुपालन चारा घोटाला पर केंद्रित मैंने मोतिहारी में झांकी निकालकर राष्ट्रद्रोह का मुकदमा भी झेली है। बिहार में सत्ता परिवर्तन होने के बाद भी क्या मिला? हम लोगों का आज सारा रोजगार बंद हो गया कला। संस्कृति विभाग के द्वारा हमें कुछ नहीं मिल पा रहा है। कभी-कभी जागरूकता अभियान पर आधारित नुक्कड़ नाटक के लिए कुछ राशि मिलती है लेकिन बहुत ही मशक्कत के बाद मिलती है।हालात ठीक नहीं है ।सचिवालय मैं वह बात नहीं है कि आप जाएं और सीधे कोई काम के लिए अनुदान मिल जाए, बहुत मुश्किल है। बहरहाल चंपारण सत्याग्रह के मौके पर जसौली पट्टी गांव में होने वाला आयोजन करप्ट संस्कृति विभाग की लापरवाही और संवेदनहीनता के कारण ठप पड़ा हुआ है। गांव के लोगों को आज मलाल है कि काश इस आयोजन का अधिकार है सरकारी करण नहीं हुआ होता।ग्रामीण कह रहे है कि " दुविधा में दोनों गए हरि मिले ना राम"

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मनोज शर्मा

मनोज शर्मा (जन्म 1968) स्वर्णिम भारत के संस्थापक-प्रकाशक , प्रधान संपादक और मेन्टम सॉफ्टवेयर प्राइवेट लिमिटेड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं।

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