मुस्लिम आरक्षण के मुद्दे पर क्या BJP और TDP में ठनेगी, 4 तरह के हैं आसार

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एनडीए सरकार का बैकबोन बन गई टीडीपी को लेकर हलचल का दौर समाप्त होने का नाम ही नहीं ले रहा है. गठबंधन की सरकारों में कई सिद्धांतों वाली पार्टियां एक साथ सरकार चलाती रहीं हैं. पर एनडीए गठबंधन की सबसे बड़ी पार्टी बीजेपी और दूसरे नंबर की पार्टी तेलुगुदेशम पार्टी का मामला कुछ ज्यादा ही अलग किस्म का है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लोकसभा चुनावों के कैंपेन के दौरान जिस तरह मुस्लिम आरक्षण को दलितों और ओबीसी के कोटे पर डाका बता रहे थे उसी दौरान तेलुगुदेशम ने स्पष्ट कर दिया था कि वो राज्य में सरकार बनने पर मुस्लिम वर्गो को मिल रहे 4 प्रतिशत आरक्षण को खत्म नहीं करेगी. यही नहीं तेलुगुदेशम पार्टी ने मुसलमानों के कल्याण के लिए और भी कई कल्याणकारी योजनाएं शुरू करने का वादा किया है. तेलुगदेशम पार्टी ने एनडीए सरकार में शामिल होने की घोषणा के साथ अपनी बात को एक बार फिर दुहराया कि मुस्लिम जनता को मिल रहे 4 प्रतिशत आरक्षण को तेलुगुदेशम सरकार खत्म नहीं करेगी. जाहिर है कि बीजेपी के लिए यह बहुत हीऑड पोजिशन होने वाली है. लोगों कीउत्सुकता इस बात को लेकर है कि दोनों पार्टियांइस मुद्दे को किस तरह हल करती हैं.दोनों ही पार्टियों की राजनीतिक तेवरोंको देखते हुए ऐसा लग रहा है कि4 तरह की स्थितियां पैदा हो सकती हैं.

1-बीजेपी करेगी नजरअंदाज

सबसे पहले स्थिति यह है कि बीजेपी इस मुद्दे पर कोई प्रतिक्रिया अभी नहीं करने वाली है. क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का विरोधकर्नाटक में मिल रहे सभी मुस्लिम जातियों (जिसमेंऊंची जातियां जैसे सैयद , पठान आदि के साथ पिछड़ी जातियों) को ओबीसी कोटे में शामिल करने से था. हालांकि अलग से दिए जा रहे मुस्लिम कोटे का भी उन्होंने विरोध किया था. तेलंगाना की रैली में मोदी ने कहा था कि कांग्रेस अपने वोट बैंक के लिए संविधान का अपमान कर रही है, लेकिन उन्हें बता देना चाहता हूं कि जब तक मैं जिंदा हूं, तब तक दलितों और OBC के हिस्से के आरक्षण को धर्म के आधार पर मुस्लिमों को नहीं बांटने दूंगा. जाहिर है पीएम का फोकस ओबीसी कोटे से दिए जा रहे मुस्लिम आरक्षण पर था. इसलिए ऐसा लगता है किएनडीए सरकार अभी फिलहाल कर्नाटक (जहां सभी मुसलमानों को दिया जा रहा है आरक्षण) और बंगाल (करीब 93 प्रतिशत मुस्लिम जनसंख्या शामिल) में जहां ओबीसी कोटे में मुसलमानों को आरक्षण दिया गया है उसी का विरोध करने वाली है. दरअसल बीजेपी की एक समस्या यह भी है कि बीजेपी शासित राज्यों में भी ओबीसी कोटे में दिया जा रहा है आरक्षण. हालांकि उसकी मात्रा बहुत कम है. जैसेउत्तर प्रदेश में कई दशकों से ओबीसी कोटे में कुछ मुस्लिम जातियों को आरक्षण दिया जा रहा है.चुनाव प्रचार के दौरान जब उत्तर प्रदेश के डिप्टी चीफ मिनिस्टर केशव प्रसाद मौर्य से इस बारे में पूछा गया तो उन्होंने चुनाव बाद समीक्षा कराने की बात कही थी.

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2-टीडीपी भी रहेगी शांत

दूसरी स्थिति यह हो सकतीहै कि तेलुगुदेशम पार्टी भी अनावश्यक विवाद न हो इसलिए शांति से सरकार चलाएगी. जैसा चल रहा है वैसे ही चलने दिया जाएगा. टीडीपी नहीं चाहेगी कि अनावश्यक विवाद पैदा हो. क्योंकि उसे आंध्र प्रदेश के लिए कई तरह के फेवर केंद्र सरकार से लेने हैं. राज्य में किए गए वादे विवाद करने से पूरे नहीं होने वाले हैं. इसके साथ ही तेलुगुदेशम पार्टी भाजपा, जनसेना के साथ जो संयुक्त घोषणा पत्र जारी किया था उसमें मुस्लिमों के लिए 4 फीसदी आरक्षण का जिक्र नहीं किया गया था . इस कारण नैतिक रूप से उसके पास ज्यादा बहस करने की गुंजाइश नहीं है. फिर भी टीडीपी नेता नारा लोकेश ने यह कहकर अपनी पार्टी की स्थिति स्पष्ट कर दी है कि आरक्षण तुष्टिकरण के लिए नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय के लिए है, क्योंकि राज्य में अल्पसंख्यकों की प्रति व्यक्ति आय सबसे कम है. उन्होंने अभी हाल ही में कहा था कि राज्य में मुसलमानों के लिए आरक्षण पिछले 2 दशकों से चल रहा है और हम इसके साथ खड़े हैं. हम इसे जारी रखने का इरादा रखते हैं . यही नहीं TDP प्रमुख चंद्रबाबू नायडू ने भी कहा है कि हम शुरुआत से 4 प्रतिशत मुस्लिम आरक्षण का सपोर्ट करते आ रहे हैं इसलिए यह आरक्षण जारी रहेगा.

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3- TDP का मुस्लिम जनता से किए अन्य वादों पर इस तरह हो सकता है काम

दरअसल मुसलमानों को दिया जा रहा 4 प्रतिशत आरक्षण जो पहले से चल रहा है वो तो चलता रह सकता है. पर पार्टी ने जो अन्य वादें किए हैं उसको लेकर विवाद की स्थिति बननी तय है. जिसमें एक है हज यात्रा पर जाने वाले मुसलमानों को एक लाख रुपये दिए जाने का वादा . मोदी सरकार ने अपनी पहली ही सरकार में केंद्र सरकार हज यात्रा पर दिए जा रहे रिबेट को खत्म कर दिया था. अब अगर सहयोगी पार्टी इस तरह का कानून बनाने का प्रयास करती है तो जाहिर है स्थानीय बीजेपी इकाई इसका विरोध करेगी. राजनीतिक विश्लेषक सौरभ दुबे कहते हैं कि यह एक ऐसा मुद्दा है कि बीजेपी सरकार इसके लिए राजी नहीं होगी. इसी तरह मौलाना को 5 हजार रुपये मानदेय़ का वादा, इमाम को 10 हजार मानदेय़, 50 साल ज्यादे उम्र के मुसलमानों को पेंशन देने का वादा, बड़ा हज हाउस बनाने का वादा, शहरों में ईदगाह और कब्रिस्तान के लिए जगह दिए जाने का वादा, 5 लाख रुपये का ब्याज मुक्त कर्ज दिए जाने का वादे पर विवाद होना तय है. पर इस विवाद का हल भी तैयार है.इस विवाद का हल यही होगा कि ये सब वादे हिंदुओं के लिए भी किए जाए. इसमें कोई 2 राय नहीं हो सकती कि तेलुगुदेशम पार्टी ये सारे वादे हिंदू जनता के लिए देने को तैयार हो जाए.

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4-जब अलग होना होगा, तबदोनों ही बनाएंगी इसे मुद्दा

सबसे व्यवहारिक सेचुएशन यही है. दोनों ही पार्टियां इन मुद्दों पर चुप मारकर अन्यकाम करती रहेंगी. जब किसी अन्य मुद्दे पर दोनों ही पार्टियों के अहमटकराएंगे तो ये मुद्दे काम आएंगे. दोनों ही ओर से तब यह दावा किया जा सकता है कि मिनिमम गारंटी प्रोग्राम से फलां पार्टी बाहर जा रही है. इसलिए हमने गठबंधन से बाहर आने का फैसला ले लिया. इसके पहले भी गठबंधन टूटते रहे हैं पर जब तक पार्टियों में एका रहता है इस तरह के विवादित मुद्दे पर कोई हाथ नहीं डालता है. साथ छोड़ते वक्त गंभीर मुद्देयाद आते हैं. जनता के बीच खुद को शहीद बताने के लिए ये काम किया जाता है. यही इस गठबंधन के साथ भी होना है. पर अभी इसमें कम से कम 2 साल लगेंगे.

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मनोज शर्मा

मनोज शर्मा (जन्म 1968) स्वर्णिम भारत के संस्थापक-प्रकाशक , प्रधान संपादक और मेन्टम सॉफ्टवेयर प्राइवेट लिमिटेड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं।

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